प्रकृति में पाए जाने वाले फूल-,पत्तियां, जानवरों, मनुष्यों, कीड़े-मकड़ों, नदियों, झरनों ,पहाड़ों, हरियाली एवं हर एक वह वस्तु जो प्रकृति द्वारा प्रदत है, उसमें सुंदरता पाई जाती है। किंतु प्रकृति में निहित सुंदरता हमें
तभी दिखाई देती है, जब हम उसे ध्यान से मंत्रमुग्ध होकर देख रहे हो। अर्थात मेरे दृष्टिकोण से सुंदरता किसी व्यक्ति या वस्तु में
नहीं होती है अपितु देखने वालों की नजरों में होती है।तभी कोई व्यक्ति या वस्तु किसी को बहुत अच्छे लगते हैं तो वहीं दूसरे व्यक्ति उससे तनिक मात्र भी प्रभावित नहीं हो पाते।प्रेम में पड़ने वाले व्यक्ति को प्रेम में अंधा भी कहा जाता है क्योंकि उसकी नजरों में दुनिया में सबसे ज्यादा सुंदर उसका प्रियतम ही है ।और यह हमारे समाज का ज्वलंत उदाहरण भी है।
अर्थात देखने वाले की नजर ही महत्वपूर्ण होती है। तभी तो सांवले और काले, साधारण सूरत वाले भी मन मोह लेते हैं वहीं दूसरी ओर गोरे रंग और तीखे नाक -नक्श वाले उनके घमंड के कारण किसी को भी नहीं सुहाते है।
हमारे भगवान राम, कृष्ण ,सीता आदि भी सांवले रंग के होने के बावजूद भी उनकी मनमोहक छवि सदा के लिए हमारे मन में रची बसी हुई है । इसी तरह आईना हमारे मन का दर्पण होता है। हम जब आईना के सामने खड़े होकर आत्ममुग्ध होकर स्वयं को निहारे, तो हमारी नजरों में हम दुनिया के तमाम खूबसूरत इंसानों में शुमार पाये जाएंगे।
देखने वालों की नजरों- नजरों में भी फर्क होता है।तभी तो दुनिया के कई लोग चांद को बहुत सुंदर कहते हैं और वहीं कुछ लोग तो उसमें भी दाग ढूंढ लेते हैं।
हमारे एक मित्र का मानना है कि आंखें मन का दर्पण होती हैं। मैं भी उनकी बात से पूर्णतः सहमत हूं। क्योंकि आपके विचार खुशी,
उल्लास, दुख ,क्रोध, दया, वात्सल्य ,करुणा इत्यादि की भावनाएं व्यक्ति की आंखों से ही झलकती है।और यही भाव सामने वाले
व्यक्ति की आंखों में आप की छवि का निर्माण भी करते हैं।दूसरे शब्दों मैं कह सकते हैं कि ईर्ष्या , द्वेष, लालच ,घृणा, नफरत ,
क्रोध इत्यादि विचार मनुष्य को कुरूप और वीभत्स रूप प्रदान करते हैं।वही प्रेम, सहयोग, भाईचारा, दया आदि गुण व्यक्ति को सुंदर बनाते हैं।
पौराणिक समय में राक्षसों का विकृत एवं भयानक स्वरूप में वर्णन किया गया है वहीं देवताओं का वर्णन सुंदर रूप में किया गया है।
वास्तव में यह रूप मनुष्यों के द्वारा कल्पना मात्र ही है ।यह मान लिया गया है कि सोच यदि विकृत होगी तो रूप विकृत ही होगा।
अतः अर्थात देखने वालों की आंखों से जो देखा गया या कह सकते हैं कि मन की आंखों से ही सुंदरता अथवा कुरूपता का निर्माण होता है ।
तभी तो हमारी मां हमें संसार की सबसे खूबसूरत स्त्री लगती है।
तो वस्तुत: सार यह है कि सुंदरता देखने वालों की नजरों में निहित होती है।
*मीना मंडल*
11/06/19
Bahut achha...sateek
ReplyDeleteThanks....can you show me your name please
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